अभी कुछ दिन ही हुए जब भारत के गृहमंत्री ने कहा था कि 2009 में अगर भारत पर कोई हमला नहीं हुआ तो इसमें सबसे बड़ा हाथ हमारी क़िस्मत का है...... जब गृहमंत्री ने ये बात कही तब सबने इसे मज़ाक समझा और मंत्री जी ने भी इसे हल्के अंदाज़ में कहा था... लेकिन क़िस्मत ने 2010 में हमारा साथ नहीं दिया और साल के शुरूआत में ही पुणे एक ज़बर्दस्त धमाका हुआ जिसमें जिसमें 10 से ज़्यादा लोगों की मौत हो गई जबकि करीब 60 लोग घायल हो गये.... ये धमाका 13 फरवरी को शाम क़रीब 7 बजे जर्मन बेकरी नामक एक होटल में हुआ, ये होटल ओशो आश्रम के ठीक सामने है और यहां विदेशी खासी तादाद में यहां आते हैं.....
पिछले कुछ सालों में आतंकवाद ने पुरी दुनिया को अपने चपेट में ले रखा है..। दुनिया के ज़्यादातर देश इसके दंश को झेल रहे हैं... लगातार इससे निपटने के लिए नए-नए उपाय किये जा रहे हैं लेकिन दहशतगर्द भी हरबार डर की एक नयी तरक़ीब ढूँढ लेते हैं.... । कभी दहशत हवाई जहाज़ पर सवार होकर आती है.., तो कभी टिफिन के डब्बों में छिपकर बैठती है.., कभी संसद भवन को अपना निशाना बनाती है.., तो कभी मंदिर- मस्जिदों को अपने चपेट में लेती है...। यहाँ तक की सबसे ताकतवर समझा जाने वाला मुल्क अमेरिका भी इससे बच नहीं पाया है। आज जब भी आतंकवाद की बात होती है तो अमेरिका के ट्विन टॉवर्स से निकलता धुँआ हमारी आँखों में कड़वाहट घोल देता है.......।
गौरतलब है कि केंद्र सरकार और खुफिया एजेंसियों ने पहले ही बताया था कि पुणे में कोई बड़ी आतंकी वारदात हो सकती है। क्योंकि 26/11 हमलों का आरोपी डेविड कोलेमन हेडली ने इस इलाके की रेकी की थी। पूछताछ में उसने सुरक्षा एजेंसियों को विस्फोट के संभावित शहरों के बारे में बताया भी था। इसके अलावा जब जांच एजेंसियों ने उसके भारत में आने वाले शहरों के बारे में पड़ताल की थी तो पुणे में बार-बार जाने की जानकारी मिली थी। इसके आधार पर ही सुरक्षा एजेंसियों ने राज्य सरकार को पहले ही चेता दिया था... लेकिन जानकारी होने के बाद भी ये धमाका हो गया और हम एक- दुसरे का मुंह देखते रह गये...।
पिछले कुछ सालों में देश में हुए बड़े बम धमाकों पर एक नज़र:
1 अक्टूबर 2001: जम्मू-कश्मीर विधानसभा कॉम्प्लेक्स पर हमला, 35 मरे...
24 सितंबर 2002: गुजरात में अक्षरधाम मंदिर पर हमला, 31 मरे...
13 मार्च 2003: मुंबई में एक ट्रेन में हुए धमाके में 11 लोगों की मौत हो गई...
14 मई 2003: जम्मू के पास सेना की एक छावनी पर आतंकवादी हमला। 30 लोग मारे गए जिनमें औरतें और बच्चे भी थे...
25 अगस्त 2003: मुंबई में एक के बाद एक दो कार बम धमाकों में 60 लोगों की मौत हो गई...
15 अगस्त 2003: असम में हुए धमाके में 18 लोग मारे गए जिनमें ज़्यादातर स्कूली बच्चे थे...
29 अगस्त 2003: नई दिल्ली के तीन व्यस्त इलाक़ों में हुए धमाकों में 66 लोगों ने अपनी जान गँवाई...
29 अक्टूबर 2005: नई दिल्ली में तीन शक्तिशाली बम धमाकों में 70 लोग मारे गए।
7 मार्च 2006: वाराणसी में हुए तीन धमाकों में कम से कम 15 लोग मारे गए जबकि 60 से ज़्यादा घायल हुए...
11 जुलाई 2006: मुंबई में कई ट्रेन धमाकों में 180 से ज़्यादा लोगों की मौत हो गई...
8 सितंबर 2006: महाराष्ट्र के मालेगाँव में कई सिलसिलेवार धमाकों में 32 लोग मारे गए...
19 फरवरी 2007: भारत से पाकिस्तान जा रही ट्रेन में हुआ धमाका, इस धमाके में 66 लोगों की मौत हो गई जिनमें से ज़्यादातर पाकिस्तान के नागरिक थे...
18 मई 2007: हैदराबाद की मशहूर मक्का मस्जिद में शुक्रवार की नमाज़ के दौरान धमाका हुआ. जिनमें 11 लोगों की मौत हो गई...
25 अगस्त 2007: हैदराबाद के एक पार्क में तीन धमाके हुए जिसमें कम से कम 40 लोग मारे गए...
11 अक्तूबर 2007: अजमेर में ख़्वाजा ग़रीब नवाज़ की दरगाह पर हुआ धमाका, धमाके में दो लोगों की मौत हो गई...
23 नवंबर 2007: वाराणसी, फ़ैज़ाबाद और लखनऊ के अदालत परिसर में सिलसिलेवार धमाके हुए जिसमें 13 लोगों की मौत हो गई और 50 से ज़्यादा घायल हो गए...
13 मई 2008: जयपुर में सात बम धमाके हुए. जिनमें कम से कम 63 लोगों की मौत हो गई...
25 जुलाई 2008: बंगलौर में हुए सात धमाके, जिनमें दो व्यक्तियों की मौत हो गई और कम से कम 15 घायल हुए...
26 जुलाई 2008: अहमदबाद में लगातार कई धमाके हुए जिनमें 49 लोग मारे गए...
13 सितंबर 2008: दिल्ली में हुए सिलसिलेवार धमाकों में 22 लोगों की मौत हो गई थी...
30 सितंबर 2008: महाराष्ट्र के मालेगांव और गुजरात के मड़ोसा शहर में हुए धमाकों में सात लोग मारे गए...
6 अप्रैल 2009: गुवाहटी के मालेगांव में ब्लास्ट में छह लोगों की मौत हो गई, और 32 घायल हो गए...
हर बार की तरह इस बार भी सरकार ने कहा कि खुफिया एजेंसियों ने हमले की आशंका पहले ही कर दी थी और राज्य सरकार को इसके बारे में सूचना भी दे दी गई थी... लेकिन अब सवाल ये उठता है कि अगर खुफिया एजेंसियों ने हमले की आशंका जताई थी तो इस हमले को रोका क्यों नहीं जा सका????
रविवार, 14 फ़रवरी 2010
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ भेजें (Atom)

नदीम अनवर साहब, आदाब
जवाब देंहटाएंआपके लेख में हर अम्न पसंद हिन्दुस्तानी की चिन्ता शामिल है.
और आपके जज़्बात को समर्थन भी..
शाहिद मिर्ज़ा शाहिद
माशा-अल्लाह! बहुत ही उम्दा ब्लॉग! बेहतर तहरीर !
जवाब देंहटाएंSashakt lekhan!
जवाब देंहटाएंAnek shubhkamnayen!
जवाब देंहटाएंHar shanti priy Hindastanee kee yahi chinta hai...
जवाब देंहटाएंnadim ab pachhtat kya hot hai jab chidiyan chug gayi khet.....
जवाब देंहटाएंlekin ye pachhtawa tab tak hota rahega jab tak humari sari suraksha agencies ekjut hokar kaam na kare.....iske kiye sarakar ko bahut ahem kadam jald uthane honge.....taki agency ki suchnaon ko halke me na liya jaye.......
anyways very nice blog......