शनिवार, 27 फ़रवरी 2010

आज़ाद को भूल गया देश

हमने जैसे प्रण कर लिया है कि हम देश को आज़ादी दिलाने में अहम भूमिका निभाने वाले क्रांतिकारियों को याद नहीं करेंगे.... आज महान क्रांतिकारी चंद्रशेखर आज़ाद की बरसी है मगर शायद ही किसी को याद रहा हो कि आज के दिन देश ने एक महान क्रांतिकारी खोया था...
आज 27 फरवरी और यही वह दिन है जब देश के स्वतंत्रता के लिए अपने प्राणों की आहुति देने वाले महान क्रांतिकारी चंद्रशेखर आज़ाद देश के नाम पर शहीद हो गये.... 27 फरवरी को जब वे अल्फ्रेड पार्क (जिसका नाम अब आज़ाद पार्क कर दिया गया है) में सुखदेव के साथ किसी चर्चा में व्यस्त थे तो किसी मुखबिर की सूचना पर पुलिस ने उन्हें घेर लिया... और मुठभेड़ में आज़ाद शहीद हुए.... लेकिन वह किसी फिरंगी की गोली का शिकार नहीं हुए बल्कि जब उनके पास गोलीयां ख़त्म हो गई तब इन्होंने आखरी गोली खुद को मार ली और खुद से किये वादे को पुरा किया कि उनके जीते जी कोई अंग्रेज उन्हें हाथ नहीं लगा सकता.... ऐसे महान वीर को शत-शत नमन...
चंद्रशेखर आजाद का जन्‍म मध्यप्रदेश के झाबुआ जिले भावरा गाँव में 23 जुलाई सन् 1906 को हुआ... वे अपने माता पिता की पाँचवीं और अंतिम संतान थे... उनके भाई बहन दीर्घायु नहीं हुए.. वे ही अपने माता पिता की एकमात्र संतान बच रहे... उनकी माँ का नाम जगरानी देवी था....
1919 मे हुए जलियां वाला बाग नरसंहार ने आज़ाद को काफी व्यथित किया 1921 मे जब महात्‍मा गाँधी के असहयोग आन्दोलन प्रारंभ किया तो उन्होंने उसमें सक्रिय योगदान दिया... यहीं पर उनका नाम आज़ाद प्रसिद्ध हुआ... इस आन्दोलन में भाग लेने पर वे गिरफ़्तार हुए और उन्हें 15 बेतों की सज़ा मिली। सजा देने वाले मजिस्ट्रेट से उनका संवाद कुछ इस तरह रहा -


तुम्हारा नाम ? आज़ाद

पिता का नाम? स्वाधीनता

तुम्हारा घर? जेलखाना

मजिस्ट्रेट ने जब 15 बेंत की सजा दी तो अपने नंगे बदन पर लगे हर बेंत के साथ वे चिल्लाते - महात्मा गांधी की जय... बेंत खाने के बाद तीन आने की जो राशि पट्टी आदि के लिए उन्हें दी गई थी उसको उन्होंने जेलर के ऊपर वापस फेंका और लहूलुहान होने के बावजूद अपने एक दोस्त डॉक्टर के यहाँ जाकर मरहमपट्टी करवायी....
सत्याग्रह आन्दोलन के दौरान जब फरवरी 1922 में चौराचौरी की घटना को आधार बनाकर गाँधीजी ने आन्दोलन वापस ले लिया तो भगतसिंह की तरह आज़ाद का भी काँग्रेस से मोह भंग हो गया...
और वे 1923 में शचिन्द्र नाथ सान्याल द्वारा बनाए गए उत्तर भारत के क्रांतिकारियों को लेकर बनाए गए दल हिन्दुस्तानी प्रजातांत्रिक संघ (एच आर ए) में शामिल हो गए....
इस संघ की नीतियों के अनुसार उन्‍होंने कई क्रांतिकारी गतिविधियों जैसे काकोरी काण्ड तथा सांडर्स-वध को अंजाम दिया.... 9 अगस्त 1925 को काकोरी कांड को अंजाम दिया गया... इसके बाद तो जैसे अंग्रेज़ों ने इस संगठन खिलाफ अभियान तेज़ कर दिया.... अंग्रेज़ चन्द्रशेखर आज़ाद को तो पकड़ नहीं सके पर अन्य सर्वोच्च कार्यकर्ताओं - रामप्रसाद बिस्मिल, अशफ़ाक उल्ला खाँ, रोशन सिंह तथा राजेन्द्र लाहिड़ी को क्रमशः 19 और 17 दिसम्बर 1927 को फाँसी पर चढ़ाकर शहीद कर दिया... इस मुकदमे के दौरान दल निष्क्रिय रहा और एकाध बार बिस्मिल तथा योगेश चटर्जी आदि क्रांतिकारियों को छुड़ाने की योजना भी बनी जिसमें आज़ाद के अलावा भगत सिंह भी शामिल थे लेकिन यह योजना पूरी न हो सकी.... 8-9 सितम्बर को दल का पुनर्गठन किया गया जिसका नाम हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एशोसिएसन रखा गया.... इसके गठन का ढाँचा भगत सिंह ने तैयार किया था पर इसे आज़ाद की पूर्ण समर्थन प्राप्त था..... आज़ाद की शहादत के बाद तो जैसे देश की आज़ादी के लिए लोग व्याकुल हो गये और आखिरकार 15 अगस्त 1947 को आज़ाद का सपना पूरा हुआ और देश आज़ाद हो गया मगर इस आज़ादी को देखने के लिए हमारे साथ ऐसे कई वीर मौजूद नहीं थे जिनके जिवन का एकमात्र लक्ष्य देश को आज़ाद कराना था.... और आज हम उन्हीं वीर शहीदों को भूल चुके हैं... क्या हम अपनी इस आदत को सुधार नहीं सकते???? क्या उन महान वीरों को याद नहीं कर सकते जिनके कारण हम आज़ाद देश में सांस ले रहे हैं???.....

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