पिछले दो सालों में यानि 2009 और 2010 में भारत के पांच परमाणु वैज्ञानिकों की संदिग्ध अवस्था में मौत हो चुकी है, और एक साल का वक्त बीत जाने के बाद भी इनके कारणों का पता नहीं चल पाया है. जून 2009 में कर्नाटक के कैगा एटॉमिक पावर स्टेशन में कार्यरत वरिष्ठ वैज्ञानिक एल महालिंगम अचानक गायब हो गये काफी तलाश करने पर लगभग पांच दिनों के बाद उनकी लाश काली नदी में विक्षिप्त हालत में मिली, महालिंगम की मौत को करवर पुलिस आत्महत्या मानती है. उनके गायब होने के बाद ऐसे कयास लगाये गये कि उनका किसी आतंकी संगठन ने अपहरण कर लिया हो. अभी हम इस घटना को भूल भी नहीं पाये थे कि 30 दिसंबर 2009 को भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र (बीएआरसी) के लैब में अचानक आग लग गयी और इसमें झुलस कर दो शोधकर्ताओं उमंग सिंह और प्रथा प्रतिम बाग की मौत हो गयी. दोनों शव इतनी बुरी तरह जल गये थे कि इनकी पहचान के लिए दोनों के परिवारों को डीएनए टेस्ट कराना पड़ा. हैरानी की बात यह है कि लैब में कोई भी ज्वलनशील पदार्थ मौजूद नहीं था. फिर आग कैसे लगी इसका पता अब तक नहीं लग पाया है. बीएआरसी ने भी अपनी रिपरेट सरकार को सौंप दी है मगर सरकार ने इस घटना की सच्चाई को अब तक साफ नहीं किया है. तीसरी घटना 22फरवरी 2010 की है जब बीएआरसी में कार्यरत मैकेनिकल इंजीनियर महादेवन पद्मनाभान अय्यर अपने मुंबई स्थित फ्लैट में संदिग्ध अवस्था में मृत पाये गये. पुलिस इसे आत्महत्या मान रही थी मगर पोस्टमार्टम रिपोर्ट में हत्या की पुष्टि की गयी. पोस्टमार्टम रिपोर्ट में ये साफ कहा गया कि अय्यर के सिर पर किसी भारी हथियार से वार किया गया, जिसके बाद उनकी मौत हुई. मगर आज तक उनके हत्यारे के बारे में पुलिस कोई सुराग हीं ढूंढ पायी है. जब पोस्टमार्टम रिपरेट में यह साबित हो चुका है अय्यर की हत्या हुई है तो उसके हत्यारे को पकड़ने में इतनी देर क्यों? इस घटना के महज 12 दिनों बाद ही यानी 5 मार्च 2010 को बीएआरसी में कार्यरत 27 वर्षीय महिला वैज्ञानिक तितल पॉल ने अपने कमरे में फांसी लगा कर खुदकुशी कर ली. पॉल ने अपने सहयोगियों से बताया था कि जल्द ही उसकी शादी होने वाली थी. फिर आखिर ऐसी क्या वजह थी कि पॉल को खुदकुशी करनी पड़ी. यह बात भी खटक रही है कि शव के पास से कोई सुसाइड नोट भी बरामद नहीं हुआ. पुलिस इस मामले में कोई भी सुराग ढूंढने में असफल रही है. इन चारों घटनाओं में एक चीज सामान्य रही सभी की मौत रहस्यमय तरीके से हुई. इन सभी मौतों की सच्चाई अब तक सामने नहीं आ पायी है. ये सभी घटनाएं अत्यंत संवेदनशील हैं क्योंकि ये सभी कहीं न कहीं परमाणु ऊर्जा से जुड़े थे और इनकी ये मौत प्राकृतिक नहीं थी. आतंकवाद के इस युग में हमारे वैज्ञानिकों की सुरक्षा बहुत जरूरी है और इस तरह की तमाम मृत्यु की पूरी जांच होनी चाहिए. ताकि ये पता लगाया जा सके आखिर वो कौन सी वजह है जिसने हमारे वैज्ञानिकों को मौत की नींद सुला दिया. कहीं देश की बौद्धिक संपदा व भारत की बढती शक्ति से बौखलाए दुश्मनों की साजिश तो नही ? वैज्ञानिकों की लगातार हो रही मौतों पर सरकार तो चुप है ही साथ ही (बीएआरसी) ने भी चुप्पी साध रखी है. ओखर इन वैज्ञानिकों की मौत का सच कब सामने आयेगा? सच को सामने लाने के लिए जांच का सही दिशा में होना बहुत जरूरी है.
शनिवार, 12 मार्च 2011
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