उससे कहना कोई आज भी तुम बिन,
हिज्र की झुलसती दोपहरी में सुलगता है,
हब्श्ज़दा रातों में पलकों से सितारे गिनता है,
शाम के उदास लम्हों में दरिया किनारे बैठ कर,
तुम्हें याद करता है,
दरख़्तों पर तुम्हारा नाम लिखता रहता है,
अक्सर हवाओं से तुम्हारी बातें करता है,
तुम्हें लौट आने को कहता है,
कोई तुमसे बिछ्ड़ कर बहुत उदास रह्ता है,
कोई तुमसे बिछ्ड़ कर बहुत उदास रह्ता है.....
गुरुवार, 26 मार्च 2009
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ भेजें (Atom)

क्या बात है....... जो आपने लिखा है..... क्या कमाल लिखा है
जवाब देंहटाएं